Saturday, January 30, 2016

"मनन करने योग्य"



परम श्रद्धेय गुरूदेव द्वारा  संचालित  धार्मिक  मासिक पत्रिका  "सिद्ध सुमन  प्रभा " में  से  साभार 















मेरी छोटी बहन कविता लखनऊ में एक टेलीफोन कार्यालय में ऑफिसर है, दो वर्ष पूर्व उसके पति की मृत्युं हो गयी थी, उस समय उसका एक मात्र पुत्र संगीत मात्र ८ माह  का था, दुर्भाग्य से उसके सास-ससुर ने भी उसे अशुभ मानकर उससे किनारा कर लिया था। मैंने जैसे-तैसे करके परिजनों के सहयोग से उसे एक मकान खरीदवा कर अलग रख दिया, पिछले दिनों से वह अपनी सर्विस कर रही थी। परसों रात्रि में अकस्मात् ही उसके एक पड़ोसी का फोन हमारे घर आया उसने बताया कि संगीत काफी बीमार है, चिकित्सकों ने ८ घंटे का समय दिया है, उसे अस्पताल में भर्ती किया गया है, शायद आज रात्रि मुश्किल से पार कर पाये। मेरी शारीरिक हालत ऐसी नहीं थी कि मैं चल भी पाऊँ अतः मैंने अपनी पत्नि को तुरंत सीतापुर से बस द्वारा लखनऊ पहुंचकर कविता को ढांढस बंधाने को कहा तथा स्वयं असहाय सा शैय्या पर पड़े-पड़े विचार करने लगा, प्रभु से प्रार्थना की कि हे प्रभु कविता ने ऐसे क्या पाप किये हैं जो इसे तीव्रतम आघात बारम्बार सहने पड़ते है। प्रभु इसकी रक्षा करो, मुझे अपने एक मित्र का उदाहरण याद आया कि श्री बालाजी महाराज शीघ्र ही कृपा करके मनोरथ पूर्ति करते हैं, मैंने सारी रात लेटे-लेटे श्री बालाजी महाराज के चरणों में प्रार्थना की तथा प्रातः काल जब मेरा मोबाइल मेरे पास बजा तो भय के मारे मेरी उसे उठाने की इच्छा नहीं हो रही थी। मुझे भय लग रहा था कि भगिनी कविता का करुण क्रन्दन मैं कैसे सुन पाउंगा, फिर भी साहस करके फोन ऑन करके सुना कविता की ख़ुश आवाज़ सुनकर जान में जान आई मैंने पूछा गुड़िया, "संगीत कैसा है ?" वह ख़ुशी के मारे सिसक पड़ी, बोली भैया, "संगीत एकदम ठीक है, आराम से सो रहा है, डाक्टरों का भी कहना था कि न जाने कैसे  इस बालक की हालत में अकस्मात् सुधार आ गया तथा उन्होंने कल ११:३० बजे रात्रि में हमें छुट्टी भी दे दी थी, मैंने कहा, मेरी बहन! श्री बालाजी महाराज, मेहन्दीपुर वालों की कृपा से यह सब हुआ है। 

Wednesday, January 27, 2016

"उपमन्यु"

परम श्रद्धेय गुरूदेव द्वारा रचित पुस्तिका "नैतिक शिक्षा" में से साभार


महर्षि धौम्य के एक शिष्य उपमन्यु भी थे। शिष्य को नियमित करने के लिए एक बार गुरूदेव ने उनके द्वारा लाई भिक्षा को स्वयं ही रख लिया तथा दोबारा भिक्षा लाने के लिए मना कर दिया। इस पर बालक उपमन्यु गायों का दूध पीने लगे, आचार्य ने वह भी रोक दिया, बालक उपमन्यु ने दूध पीने के पश्चात् गाय के बछड़ों के मुँह पर लगे फेन को चाटना शुरू कर दिया उसे भी श्री गुरूदेव ने रोक दिया, एक दिन गौ चराते समय भूख से अत्यंत व्याकुल होकर ब्रह्मचारी उपमन्यु ने आक के पत्ते खा लिये, जिससे दोनों आँखों से अंधे हो गये तथा भटक कर जल से रहित एक कुएँ में गिर पड़े। वे आर्तस्वर में अपने श्री गुरूदेव को पुकारने लगे। महात्मा धौम्य ने कुएँ के समीप आकर कहा पुत्र क्षुधा पर नियंत्रण नहीं हो पाने के कारण तुम्हारी यह स्थिति हुई है फिर भी मैं तुम्हारी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूँ। कुएँ में रहकर ही अश्वनी कुमारों को प्रसन्न करने के लिये मंत्र जाप करो। उनके आदेश पर बालक उपमन्यु ने अश्वनी कुमारों की स्तुति की। बालक उपमन्यु की प्रार्थना से प्रसन्न होकर देव वैद्यों ने उसे औषध के रूप में मालपुआ खाने को दिया, परन्तु गुरू को निवेदन किये बिना खाने के आग्रह को बालक उपमन्यु ने टाल दिया। उपमन्यु की यह बात देखकर गुरूदेव और देव वैद्य सभी द्रवित हो उठे। अत्यंत भावुक होकर महात्मा धौम्य ने अपने आशीर्वाद के साथ उपमन्यु को पुआ खाने का निर्देश दिया। जिसके खाते ही बालक उपमन्यु को औषधीय प्रभाव से नेत्र ज्योति प्राप्त हो गयी तथा श्री गुरूदेव ने भी उन्हें प्रसन्न होकर सर्वश्रेष्ठ विद्वान्बनने का आशीर्वाद दिया। 

Sunday, January 24, 2016

"महात्मा उद्दालक"

परम श्रद्धेय गुरूदेव द्वारा रचित पुस्तिका "नैतिक शिक्षा" में से साभार















महर्षि आयोदधौम्य जंगल में रहकर अनेक विद्यार्थियों को पढ़ाया करते थे। उस समय छात्रों का वास दिन रात आचार्यों के ही समीप हुआ करता था तथा वे विद्या अध्ययन के साथ -साथ कठिन परिश्रम भी करते थे। एक बार महर्षि ने अपने प्रिय शिष्य आरूणि को धान के खेत की मेढ़ ठीक करने के लिये भेजा। नन्हा बालक बार -बार मिट्टी डालने पर भी मेढ़ से बहते पानी को नहीं रोक सका। फिर वह खुद ही मेढ़ में लेट गया तथा रात्रि होने पर भी जब महर्षि धौम्य ने आरूणि को आश्रम में नहीं देखा तो वे चिन्तित होकर स्वयं खेत की ओर दौड़ पड़े। भावुक होकर अपने पुत्र के समान प्रिय शिष्य को गले से लगा लिया। बालक फिर भी यही कहता रहा गुरूजी मैं वहीं लेट जाता हूँ अन्यथा खेत का सारा पानी बाहर बह जायेगा। गुरूदेव अत्यंत द्रवित होकर बोले - बेटा तूने मेरी आज्ञा का पालन करने के लिये अपने प्राणों तक की परवाह किये बिना कार्य किया है। मैं तुझ पर अति प्रसन्न हूँ। अतः योग विधि से समस्त विद्यायें आज ही प्राप्त हो जायेंगी। प्रसिद्ध गुरू भक्त आरूणि नाम का यह बालक उसी समय से महर्षि उद्दालक के नाम से प्रसिद्ध हो गया। 

Friday, January 22, 2016

"देवऋषि नारद "

परम श्रद्धेय गुरूदेव द्वारा रचित पुस्तिका "नैतिक शिक्षा" में से साभार


















छान्दोग्य उपनिषद् में एक कथा आती है कि देवऋषि नारद ने सनतकुमार से कहा कि मैंने वेद, इतिहास, पुराण, विज्ञानं, गणित, विधिशास्त्र, भूत विद्या, नक्षत्र विद्या, देवजन विद्या तथा ब्रह्म विद्या आदि सब पढ़े हैं। में मन्त्रवित् हूँ परन्तु आत्मवित् नहीं अर्थात् शाब्दिक ज्ञान मात्र मेरी वाणी में है क्रिया में नहीं। इतना सब होने पर भी मेरा चित्त अशान्त रहता है कृपया मुझे परमशान्ति का कोई उपाय बतायें इस पर सनतकुमार जी ने कहा आप पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त करने पर ही अपने को रोको मत उससे भी आगे बढ़कर गुरू  के समीप रहकर अपने मन और अन्तर्शक्ति के जागरण के लिए मानवीय -चारित्रिक गुणों का विकास करें। बेटा! जिस प्रकार माँ यदि शिशु की देखरेख कम कर दे तो उसके संस्कारों में कमी आ जाती है उसी प्रकार विद्या प्राप्ति के पश्चात् भी यदि गुरू का सामीप्य माँ की भाँति नहीं प्राप्त कर सके तो ज्ञान की कक्षा आधी रह जाती है। अतः हे नारद विद्या प्राप्ति के पश्चात् भी गुरूओं के समीप सदैव शिष्ट, विनम्र एवं आभारयुक्त रहकर ही आप पूर्ण विकास को प्राप्त कर सकते हैं। सनतकुमार जी की आज्ञा से नारद ने पुनः शिव सानिध्य में रहकर पूर्णता प्राप्त की। 

Thursday, January 21, 2016

"नैतिक कर्तव्य "

परम श्रद्धेय गुरूदेव द्वारा रचित पुस्तिका "नैतिक शिक्षा" में से साभार












"जिसको न निज गौरव न निज देश का अभिमान है। 
वह मनुष्य नहीं पशु निरा, और मृतक समान है।।"
अर्थात् जिस मनुष्य को अपने राष्ट्र, राष्ट्र के गौरव, उत्थान एवं विकास का ध्यान न हो वह व्यक्ति पशु के समान तो है ही साथ ही मरा हुआ भी है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को अपने निकट की राष्ट्रीय सम्पत्ति, मुख्य मार्गों, औषधालयों आदि की स्वच्छ्ता, सुरक्षा एवं वृद्धि के लिये अथक प्रयत्न करने चाहिये। वह व्यक्ति ही सर्व प्रकार से सुखी हो सकता है जो स्वयं तो राष्ट्र के लिये कार्य करता ही हो तथा समाज के दूसरे लोगों को भी राष्ट्रहित के कार्यों में लगाता हो। इसके साथ ही मनुष्य मात्र का यह भी कर्तव्य है कि वह राष्ट्र के सर्वतोन्मुखी विकास के लिये सार्वजनिक स्थानों पर पूर्णतया मद्यनिषेध, धूम्रपान निषेध तथा अन्य कुरीतियों को भी राष्ट्रहित में रोकें तथा उसके लिये जीवन के अल्प समय की तो बात ही क्या प्राणों तक के उत्सर्ग को भी तत्पर रहना चाहिये। 

"जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं। 
वह हृदय नहीं एक पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।"  

Monday, January 18, 2016

"हमारा समाज एवं कर्तव्य "

परम श्रद्धेय गुरूदेव १००८ श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ विद्वद वरिष्ठ दण्डी स्वामी महादेव आश्रमजी महाराज (वीतराग ब्रह्मचारी श्री महेश चैतन्य जी महाराज ) द्वारा रचित पुस्तिका "नैतिक शिक्षा" में से साभार




मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है अतः परिवार के आकार प्रकार एवं प्रभाव का समाज में सीधा दर्शन होता है। यदि परिवार के लोग दूसरे परिवारों के प्रति सद्भावना,कर्तव्यपरायणता, सौहाद्र तथा सम्मान का व्यवहार रखें तो आज हत्या, लूटपाट, अराजकता तथा भ्रष्टाचार का जो नग्न ताण्डव हो रहा है वह समाप्त हो जायेगा। अतः प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह समाज में संघ बनाकर व्यक्तियों को मानवता के सभी मूल्यों से अवगत कराये। प्रत्येक मौहल्ले में सभी वर्गों के लिये सार्वजनिक भवनों का निर्माण कर उनमें समाज के प्रति दायित्व से लोगों को अवगत कराना चाहिये। निःशुल्क शिक्षा, प्रौढ शिक्षा एवं लघु उद्योग धंधों आदि का प्रशिक्षण देकर समाज को साक्षर, शिक्षित एवं स्वावलम्बी बनाना चाहिये। सदैव परोपकार करते हुए सुदृढ़, अस्पृश्यता से रहित, बहादुर, विशाल हृदय वाले समाज का गठन प्रत्येक नैतिक व्यक्ति को करना चाहिये। समाज के प्रतिष्ठित लोगों को दहेज़ रहित विवाह, दलितोद्धार एवं समाज के लिये आवश्यक कार्यों को धनादि खर्च करके भी अवश्य करना चाहिये। 

"जो जल बाढ़े नाव में घर में बाढ़े दाम। दोऊ  हाथ उलीचिये यही सज्जन का काम। "

Sunday, January 17, 2016

"अपना जीवन "



परम श्रद्धेय गुरूदेव १००८ श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ विद्वद वरिष्ठ दण्डी स्वामी महादेव आश्रमजी महाराज (वीतराग ब्रह्मचारी श्री महेश चैतन्य जी महाराज ) द्वारा रचित पुस्तिका "नैतिक शिक्षा" में से साभार 


बड़ों का आदर करना, साफ़ शुद्ध रहना, अपने निकट की सभी वस्तुओं का उचित संरक्षण करना, बिना पूछे किसी की वस्तु न लेना, बड़े बूढ़ों एवं रोगी तथा बालकों की सहायता करना, ईमानदार रहना, अतिथि सत्कार करना, गुरूजनों का आदर करना, सत्शास्त्रों का चिंतन करना आदि नैतिक ज्ञान है। उपरोक्त के अतिरिक्त और भी बहुत सारी बातें नैतिकता में आती हैं। जैसे सत्य अहिंसा अपरिग्रह आदि। भगवान वेदव्यास ने बड़ा सरल उपाय बताते हुए कहा है---
"आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां  न समाचरेत्"
अर्थात् जो कार्य आपको अपने साथ दूसरों के द्वारा किये जाने पर अच्छा न प्रतीत होता हो, वह कार्य आप कदापि दूसरों के साथ न करें।
अतः प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने परिवार में स्वयं स्वच्छ्ता, ईमानदारी, कर्तव्य-परायणता, परिश्रम से युक्त होकर अपने परिवार के अन्य सदस्यों को इनके लाभ से अवगत कराना चाहिए। हमें परिवार के सभी सदस्यों को यह शिक्षा देनी चाहिए कि हमें अपने दैनिक कार्यों के निर्वाह मात्र में ही सारा समय नष्ट नहीं कर देना चाहिए। हमें प्रत्येक दिन कुछ न कुछ कार्य दूसरों के लिए अवश्य करना चाहिए। जिस मार्ग पर हम चलते हैं उसकी सफाई करना, उसको गन्दा न करना तो हमारा अपना ही कार्य है क्योंकि हम उस मार्ग पर चलते जो हैं यह परोपकार कहाँ हुआ अतः हमें अपने परिवार को इन सब बातों से अवगत कराकर अपना कार्य तो अवश्य ही करना चाहिए तथा सदैव सभी को दूसरों का कार्य भी करने की प्रेरणा देनी चाहिए। यहाँ यह जान लेना अत्यंत आवश्यक है कि अपने कार्यों को करने के पश्चात् ही दूसरों के लिए कार्य करना उचित है तथा एकमात्र अपने ही कार्यों में सारा समय नष्ट कर देना दूसरों के लिए कुछ भी समय न निकालना आत्मघात जैसा कार्य है। हमें अपने परिवार में व्यर्थ बैठकर गप लड़ाने वाले आगन्तुकों को रोकना ही होगा तथा स्वयं भी परिवार के सदस्यों को केवल व्यर्थ की बातें करने में ही समय नष्ट करने से रोकना होगा। परिवार के सभी सदस्यों को प्रातःकाल जल्दी उठकर अपना कार्य स्वयं करना चाहिए तथा यदि हो सके तो परिवार के दूसरे सदस्यों के कार्यों में भी उनकी प्रसन्नता के लिये सहायता करनी चाहिये। आलस्य में पड़े रहकर दूसरों का मुँह ताकना बुरी बात है। परिवार में भगवान के प्रति आभार प्रकट करने की (प्रार्थना करने की) आदत सभी को डालनी चाहिये जिससे सभी लोग अनुशासित रहकर परिवार एवं राष्ट्र के उत्थान के लिये सुदृढ़ हो सके। यदि परिवार का कोई व्यक्ति अपने बुरे स्वभाव के कारण दूसरों का अपमान भी करता हो, उसे भी सहन करना चाहिये। स्वयं विनम्र होकर उसे ऐसा करने से रोकना चाहिए। सदा भयभीत करके ही दूसरों को नहीं सुधारा जा सकता। संक्षेप में यही कहना चाहिए कि परिवार के सभी सदस्यों को स्वयं आलस्य, क्रोध आदि को त्यागकर दूसरे पारिवारिक सदस्यों की सुख सुविधा का ध्यान रखना चाहिए, सभी को अपना अपना कार्य स्वयं करना चाहिए तथा अन्य सदस्यों को भी ऐसी ही शिक्षा देनी चाहिए।
माँ संसार का प्रथम गुरू है बालक माँ के समीप रहकर बचपन में ही पुस्तकों से कहीं ज्यादा सीख सकता है। अतः नारी को सर्वप्रथम सुसंस्कृत होकर परिवार के लिये अच्छे संस्कार देना अनिवार्य हो जाता है। 

Thursday, January 14, 2016

"अपना सुधार"

परम श्रद्धेय गुरूदेव १००८ श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ विद्वद वरिष्ठ दण्डी स्वामी महादेव आश्रमजी महाराज (वीतराग ब्रह्मचारी श्री महेश चैतन्य जी महाराज ) द्वारा रचित पुस्तिका "नैतिक शिक्षा" में से साभार 


हमारे देश भारतवर्ष के गुजरात प्रान्त के काठियावाड जिले में एक वृक्ष के नीचे बाबा बुद्धदास नाम के एक संत रहा करते थे। वह सदा लोगों को अच्छी शिक्षा दिया करते थे तथा आवश्यकता पड़ने पर अपनी पर्णकुटी में रखकरभी भी लोगों को दिन रात योगाभ्यास आदि जीवनोपयोगी कार्य सिखाया करते थे। स्वयं अपना जीवन बड़ा सरल एवं अभावग्रस्त रखते थे। सर्व समर्थ होते हुए भी वह ऐसा कोई भी कार्य कदापि नहीं करते थे जिसका अन्य व्यक्तियों पर कुप्रभाव पड़ता हो। एक बार एक निर्धन किसान उनके पास अपने पुत्र को ले जाकर कहने लगा कि मेरा यह पुत्र बहुत ज्यादा खाने का आदि हो गया है जिससे इसका स्वास्थ्य हर समय खराब रहता है। मैंने बहुत सारे रूपये इसकी चिकित्सा आदि में खर्च किये परन्तु पथ्य का पालन न करने से उल्टा स्वास्थ्य खराब होता चला गया। वह किसान गिड़गिड़ाकर कहने लगा कि आप कृपया मेरे पुत्र का किसी प्रकार पथ्य ठीक करा दें। महात्मा बोले --ठीक है, अपने पुत्र मंगल को मेरे पास छोड़ जाओ। बालक मंगल स्वामीजी के सानिध्य में उनकी कुटिया में रहने लगा। उसके स्वास्थ्य के अनुकूल भोजन जो स्वामीजी ने दिया था उसे खाकर थोड़ी ही देर के बाद मंगल आश्रम के वृक्षों पर चढ़कर फल खाने लगा, फिर उसने सोचा कि सांय होने लगी है आज पिताजी तो नहीं हैं अतः अकेले ही दूध पी लूं। फलतः उसको अजीर्ण में कोई लाभ नहीं मिला। अगले दिन जब बालक मंगल दोबारा पहले की भांति ही करने लगा तब महात्मा ने बालक के पास जाकर बड़े प्यार से उसका सिर सहलाते हुए कहा, "बेटा मंगल! जब आश्रम के सभी लोग भोजन के पश्चात् अपने -अपने कार्यों में लग जाते हैं तुम अकेले तब भी खाने पीने की चीज़ों को ही ढूँढ़ते रहते हो, बेटा! केवलाघो भवति केवलादि अर्थात् जो व्यक्ति अकेले ही भोजन करता है वह केवल पाप का भक्षण ही किया करता है। तुम नित्यप्रति यही भूल करते हो इसलिये तुम्हारा स्वास्थ्य ख़राब रहता है तुम्हें भी आश्रम के अन्य विद्यार्थियों की भांति आचरण करना चाहिए। बालक मंगल मात्र छः दिनों में ही अपने दूसरे साथियों की तरह संयमित हो गया जिससे उसका स्वास्थ्य तेज़ी से सुधरने लगा।
अतः यदि मनुष्य का स्वयं का आचरण अच्छा हो तो उसके निकट रहने वाले लोग भी उनके अनुसार आचरण करके परमसुखी हो जाते हैं। हमें सर्वप्रथम स्वयं को सुधारने का प्रयत्न करना चाहिए। 

Tuesday, January 12, 2016

"कौन अपना ?कौन पराया ?"

परम श्रद्धेय गुरूदेव १००८ श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ विद्वद वरिष्ठ दण्डी स्वामी महादेव आश्रमजी महाराज(वीतराग ब्रह्मचारी श्री महेश चैतन्य जी महाराज ) द्वारा  संचालित  धार्मिक  मासिक पत्रिका  "सिद्ध सुमन  प्रभा " में  से  साभार 



विचार करें, परमात्मा अपने है कि संसार अपना है? हमें संसार प्यारा लगता है कि भगवान प्यारे लगते है? सदा हमारे साथ संसार रहेगा कि भगवान रहेंगे? हम परमात्मा के अंश है -"ममैवांशो जीव लोके" (गीता१५/७) फिर हमें परमात्मा प्यारे न लगे, संसार प्यारा लगे। क्या यह उचित बात है? नहीं यह ठीक नहीं है, परन्तु प्यारों! आप मानो या न मानो, कहो या न कहो।  हम जानते है कि भगवान के अंश होते हुए भी आपको प्रथम प्यार भगवान से नहीं होकर संसार से है। बोलो है कि नहीं, हैं, हैं और हैं। जो लोग अभी मेरे सामने बैठकर इस बात का उत्तर नहीं दे रहे है, वे सर्वत्र ठीक नहीं है, वे केवल दर्शा मात्र रहे हैं,अथवा यो कहिए कि वे चाहते हैं भगवान से ज्यादा प्रेम करना परन्तु अभी ज्यादा प्रेम अज्ञानवश संसार से ही कर रहे है, केवल वाणी से कहने भर से ही भगवान के प्रति प्रथम प्रेम या अगाध प्रेम नहीं हो जाता है वह तो लगातार प्रयास एवं दृढ़ निश्चय के करने से ही हो सकता है। आप मनुष्य जीवन के निर्वाह को मानकर जो सद् आचरण पूर्वक सांसारिक कार्यों को करते जा रहे है यह भी भगवान के प्रति प्रथम प्रेम में नहीं आता है क्योंकि शुद्ध आचरण के पश्चात् भी आपकी गति अभी सांसारिक कार्यों की ओर ही है। जैसे एक छोटा बालक विद्यालय के मान के अनुरुप वस्त्रों को पहन कर यथा समय स्कूल चला जाये वहां अनुशासित रहे परन्तु पढ़े नहीं तो स्कूल के अध्यापकों का एक ही उत्तर होगा की और सब तो बहुत अच्छा है परन्तु पढ़ाई में बेकार है अर्थात् अच्छे आचरण एवं अनुशासन में रहने के साथ ही बालक को मेहनत-पूर्वक पढ़ना चाहिए तभी वह अपने मानक को प्राप्त कर सकेगा। उसी प्रकार आप शुद्ध आचरण पूर्वक जीवन जीते हुए भी जब तक एक मात्र संसार के ही कार्य करते रहोगे तब तक कैसे हम मान लें कि आपका प्रथम प्रेम, अगाध प्रेम श्री भगवान के चरणों में है। अब आपको अपनी स्थिति का ज्ञान हो गया होगा? कुछ लोगों की गर्दन मेरे सामने हिलती नज़र आ रही है, इसलिए हम कहते हैं कि अज्ञानवश आप अभी भी संसार से ही प्रथम प्रेम करते आ रहे है तथा चिल्लाते है कि भगवान भी अपने भक्तों की ही परीक्षा लेते हैं। कभी-कभी तो यहां तक कहते हैं कि जो भगवान की भक्ति करते हैं भगवान भी उन्हीं को ज्यादा कष्ट देते है, एक बार मुझसे एक भक्त जी ने ऐसा ही कहा, मैंने उसका उत्तर दिया यदि आपकी यह बात ठीक मान ली जाये तो मेरा सारा जीवन तो कष्टमय ही बीतना चाहिए था, अब भक्त जी के पास कोई उत्तर नहीं था।मैंने कहा यदि भजन के बदले, साधना के बदले कष्ट मिलते होते तो मैंने जीवन में भजन के अलावा कुछ किया ही नहीं तो फिर मेरा हाल क्या होना था? प्रसंग से इसका उत्तर देते है।भगवान नाम स्मरण में पापों को समाप्त करने की, मनुष्य के चित्त से बाहर निकालने की एक अद्भुत क्षमता होती है तथा पाप समाप्त होने से तो आनंद और भी ज्यादा बढ़ता ही है। जैसे घर में जब मनुष्य झाड़ू लगाता है तो घर से कूड़ा बाहर आता है। उसी प्रकार भगवान नाम लेने से तो पाप रूपी कूड़ा निकल जायेगा, परन्तु जैसे जो लोग अपने खुले घरों में आठवें या दसवें दिन मात्र एक बार झाड़ू लगाते हैं तो उन्हें अपना मकान बुहारने में कष्ट भी ज्यादा होता हैं  तथा कूड़ा भी ज्यादा बाहर निकलता है। ठीक उसी प्रकार यदा -कदा भगवान का स्मरण जो लोग करते हैं , उनका पाप रूपी कूड़े का ज्यादा बड़ा ढ़ेर जो बाहर निकलता है वे उसी से विचलित हो जाते हैं, कहते हैं भगवान परीक्षा लेते हैं। वास्तव में ऐसी बात नहीं है। बात चली थी कि हम भगवान का अंश होते हुए भी क्यों संसार को प्रथम प्यार करते हैं? इसका कारण यही है कि हम हम तात्कालिक सुख ढूंढते है। जरा विचार करो --
संसार तो हरदम हमसे दूर होता जा रहा है, क्षण भर भी हमारे साथ नहीं रहता और परमात्मा सदा हमारे साथ रहते हैं, क्षण भर भी दूर नहीं होते। फिर भी हमारी दृष्टि परमात्मा की तरफ नहीं है, प्रत्युत संसार की तरफ है। हम भगवान के अंश है तो हमें भगवान प्यारे लगने चाहिए, शरीर व संसार का संबंध हरदम छूट रहा है। हमारी उम्र में जितने वर्ष बीत गये, उतना तो संसार छूट ही गया, यह प्रत्यक्ष बात है, एकदम सच्ची तथा पक्की बात है। जिस क्षण जन्म हुआ उसी क्षण से शरीर व संसार हमसे दूर जा रहे है। संसार की प्रत्येक वस्तु प्रतिक्षण बदल रही है परन्तु भगवान नहीं बदलेंगे । वे कभी हमसे दूर नहीं होंगे, सदा साथ रहेंगे। हम सदा भगवान के साथ हैं और भगवान सदा हमारे साथ है। जो शरीर एक क्षण भी हमारे साथ नहीं रहता, वह शरीर हमें प्यारा लगता है और लोगों की दृष्टि में हम भगवान की तरफ चलने वाले सत्संगी कहलाते हैं। विचार करें कि हम सत्संगी हुए या कुसंगी? हम सत् का संग करते है कि असत् का संग करते है? हमें सत् प्यारा लगता है कि असत् प्यारा लगता है? कम से कम इस बात का तो होश होना चाहिए था कि संसार हमारा नहीं है।
हम परमात्मा का अंश होने से मल रहित है-- 'चेतन अमल सहज सुखरासी' (मानस, उत्तर -११७/१ ) परन्तु संसार का संग करने से मल ही मल लगता है, दोष ही दोष लगता है, पाप ही पाप लगता है संसार के संग से लाभ कोई नहीं होता है। हम शरीर में कितनी ममता रखते है? उसको अन्न जल देते है, कपड़ा देते है, आराम देते है, उसकी संभाल रखते है, पर शरीर हमारा बिलकुल कायदा नहीं रखता। रात को भूल से शरीर से कपड़ा उतर जाये तो शीत लग जाता है, बुखार आने लगता है। रोटी देने में एक दिन देरी हो जाये तो कमजोर हो जाता है। हम तो रात दिन शरीर के पीछे पड़े है, फिर भी यह हमारी भूल को माफ नहीं करता और सदा हमारा हित चाहने वाले भगवान और उनके भक्त हमें प्यारे नहीं लगते।
प्रत्येक व्यक्ति को विचार करना चाहिये कि हमें कौन अच्छा लगता है? जो भगवान में व उनके भजन सुनने में लगाता है वह अच्छा लगता है? या फिर जो संसार में लगाता है? शरीर व संसार हमारे साथ नहीं रहते है परन्तु धर्म हमारे साथ रहता है, ईश्वर हमारे साथ रहता है, न्याय हमारे साथ रहता है, सच्चाई हमारे साथ रहती है, विचार करें कि हम सच बोलते है या झूठ बोलते है? हमें न्याय अच्छा लगता है या अन्याय अच्छा लगता है? ईमानदारी अच्छी लगती है या बेईमानी अच्छी लगती है? हमें न्याय अच्छा लगता है तो उसका फल क्या होगा? भोग अच्छे लगते है तो उसका फल क्या होगा? भोग भोगने से हमें लाभ हुआ है या नुकसान हुआ है? अपने जीवन को संभालें  और सोचें कि हम क्या कर रहे हैं? और किधर जा रहे हैं? हमें क्या अच्छा लगता है? संसार क्या फायदा करता है? व भगवान क्या नुकसान करते हैं? जरा विचार करो --
संसार स्वार्थी, सब स्वार्थ के है ,पक्के विरोधी परमार्थ के है। 
देगा न कोई दुःख में सहारा , सुन तु किसी की मत बात प्यारा। 

अरे! भगवान ने शरीर दिया, आँखें दी, हाथ दिये, पाँव दिये, बुद्धि दी, विवेक दिया, सब कुछ दिया, उनसे सुख पाते हैं पर भगवान को याद नहीं करते भगवान से मिली हुई चीज़ तो अच्छी लगती है पर भगवान अच्छे नहीं लगते, क्या ये उचित है? महाभारत में कहा है --
यस्य स्मरण मात्रेण जन्म संसार बन्धनात्।।
विमुच्यते ----------------------------------------- ।।
अर्थात् जिनको याद करने मात्र से ही संसार का जन्म मरण का बन्धन छूट जाता है। कुछ मत करो, कोई चीज़ मत दो, केवल याद करो तो भगवान राजी हो जाते है। 
'अच्युत स्मृति मात्रेण '।
हरि ॐ  जय गुरूदेव ।।

Sunday, January 10, 2016

"न्याय "











  
पूज्यपाद दण्डी स्वामी श्री महादेव आश्रम जी महाराज 
 ब्रह्मचारी महेश चैतन्य 


"इस जग में रहकर प्यारे जो सूरज बनना चाहोगे। 
मिटा पाप सब दीन दुःखी का अपना मान बढ़ाओगे।।
जो चाहो तुम सारी दुनिया गीत तुम्हारे ही गाये। 
प्यारे बच्चो! फिर जीवन में नैतिक शिक्षा ही अपनायें।।"

सम्पूर्ण मानव जाति का उपकार करने की आशा से महर्षि पतंजलि ने अपने योगसूत्र में बताया है---"शौचः संतोष तपः स्वाध्यायेश्वर प्रषिधानानी नियमाःटट
अर्थात्---
(अ ) शौच --अपने शरीर एवं वस्त्रों को साफ रखना। 
(ब ) संतोष--अपने स्वयं के अधिकार में प्राप्त साधनों एवं सामग्री से ही धैर्यपूर्वक अपने कार्यों को करना तथा दूसरों के साधन के प्रति लालच ना करना। 
(स) तप--कार्य को करते समय एकमात्र लक्ष्य की ओर ही मुख्य चिन्तन करते रहना, तथा श्रम, थकावट आदि को धैर्यपूर्वक कार्य होने तक सहन करना एवं पूर्ण मनोयोग से कार्य शक्ति को उसी कार्य के लिये प्रयोग करना तप है।
(द) स्वाध्याय--कार्य करते समय अपनी कार्य प्रणाली को सदा इस भावना से स्वयं निरीक्षण करते रहना कि कार्य में कहीं दोष न आ जाये,स्वाध्याय कहलाता है। 
(य) ईश्वर प्रणिधान--सदैव बड़ों के प्रति आदर सम्मान की भावना रखना, उनके द्वारा दर्शाये मार्गों का अनुसरण करते रहना तथा सदैव बड़ों के प्रति आभार ज्ञापन करना ईश्वर प्रणिधान का उद्देश्य है। 
यही नैतिक शिक्षा है।  संक्षेप में कहा जा सकता है कि स्वयं साफ रहना,बड़ों का आदर करना, परस्पर प्रेम की भावना रखना, सदैव दूसरों के हित की कामना करना, सदा सत्य बोलना, ईश्वर के प्रति आभार एवं श्रद्धा रखना, उच्च आदर्शों पर जीवन जीना, सदा न्यायप्रिय होना ही नैतिक शिक्षा है। 
महत्त्व--जैसे अच्छी सामग्री होने पर भी बिना विधि के बनाया गया भवन असुंदर, असुरक्षित तो होता ही है साथ ही अपनी आयु से पूर्व ही समाप्त भी हो जाता है उसी प्रकार सत्य, सौहाद्र, निष्ठा, प्रेमभावना, परोपकार, धैर्य, प्रतीक्षा, आत्मनिरीक्षण के बिना संसार के सब कार्य व्यर्थ हैं। 
प्राचीन काल में फल्गू नाम का एक भील राजा था वह न्यायप्रिय, कुशल प्रशासक, अपनी प्रजा का संतान की तरह पालन करता था। उसके उत्कल एवं वल्कल नाम के दो पुत्र थे यों तो बड़ा पुत्र उत्कल बड़ा बलवान था परन्तु उसे प्रजा को तंग करने में, जंगल के दुर्बल जंतुओं को सताने में बड़ा आनन्द आता था वह नाना प्रकार से प्रजा को तंग किया करता था प्रजाजन उसके डर से अपने राजा के सामने उसकी शिकायत नहीं करते थे इसके विपरीत उसका दूसरा भाई वल्कल बड़ा बहादुर, उदार तथा प्रजा के साथ अपने परिजनों जैसा श्रेष्ठ व्यवहार किया करता था वह राजपुत्र होने पर भी बड़े बूढ़ों का बहुत आदर तो करता ही था, अन्य जंगली जीव जन्तुओं से भी स्नेह किया करता था।सभी प्रजाजन अपने राजा की ही भांति उसका बड़ा आदर व सम्मान किया करते थे। राजा फल्गू अपने पुत्र के अत्याचारों से अनभिज्ञ था अतः उसने अपने बुढ़ापे को निकट समझकर बड़े पुत्र उत्कल को राजा बनाने की सोची। यह सुनते ही प्रजाजन तो भय से काँपने लगे। उन्होंने समाज के बड़े बूढ़ों के सहयोग से उत्कल को राज्य से दूर करने की योजना बना डाली तथा अपने प्रिय राजा के सम्मुख निवेदन किया --महाराज! समीप के जंगल में उरग नामक महादानव रहता है वह जंगल में गये हुए पशुओं एवं लकड़हारों तक को खा जाया करता है। आप उस महादानव का अंत करके प्रजाजनों को सुखी करें। प्रजाजन की इस आर्त पुकार को सुनकर राजा फल्गू अपने बड़े पुत्र उत्कल को अधिक बहादुर जानकर उरग नाम के महादानव से मल्लयुद्ध के लिये भेजते हैं। अभिमानी, अत्याचारी उत्कल अकड़ता हुआ मल्लयुद्ध के लिये चल पड़ता है। कई दिनों तक मल्लयुद्ध करते-करते उत्कल मारा जाता है तथा २७ दिन की निश्चित अवधि तक लौटकर न आने पर उत्कल को मरा जानकर उसके छोटे भाई न्यायप्रिय वल्कल का राज्याभिषेक कर दिया जाता है। इस प्रकार जो लोग सदैव नीति धर्म का पालन करते हैं उनके लिये लोग स्वयं ही उच्च पद की कामना किया करते हैं। 


Friday, January 8, 2016

१००८ श्री परम पूज्य दण्डी स्वामी महादेव आश्रमजी महाराज शुकतीर्थ-एक संक्षिप्त परिचय

"अभिनन्दन -पत्र "


परम पिता परमात्मा की सृष्टि में समय -समय पर अनेक महापुरुषों का अवतरण होता रहा है। सृष्टि के इसी अनुक्रम में एक बार की बात है कि --
एक ब्राह्मण दम्पत्ति पुत्र प्राप्ति की इच्छा से स्वामी बालचन्द्रानन्द सरस्वतीजी महाराज के पास गये। संत ने तथास्तु कहकर उन्हें विदा किया। संत की कृपा एवं आशीर्वाद के परिणाम स्वरूप ब्राह्मण दम्पत्ति के घर पुत्र का जन्म हुआ। जन्मित बालक बचपन से ही भगवत् चरणानुरागी ,सत्यनिष्ठ , धर्मप्रेमी एवं कुशाग्रबुद्धि संपन्न था। यही बालक जनपद में सदैव शैक्षिक स्तर पर विशेष योग्यताएॅ प्राप्त करता हुआ प्रान्तीय स्तर पर भी स्थान प्राप्त करता रहा।अपनी प्रतिभा एवं योग्यता के बल पर बालक कम उम्र में ही अतिशीघ्र विद्युत इंजीनियरिंग की उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सफल हुआ। 
पश्चिमी उत्तरप्रदेश के प्रसिद्ध संत श्री स्वामी विवेकानन्द के आदेश पर ये इंजीनियर बालक हरिद्वार स्थित सप्त सरोवर में एक आश्रम का निर्माण कराने आया। वहीं से बालक के मन में संत जीवन के प्रति विशेष आस्था एवं निष्ठा जागृत हुई। फलतः अस्सी के दशक में ही बालक ने नैष्ठिक ब्रह्मचर्य की दीक्षा ग्रहण कर ली और प्रसिद्ध संत श्रीहरिहरतीर्थ जी महाराज से विश्व प्रसिद्ध कैलाश आश्रम ऋषिकेश में संस्कृत शिक्षा का ज्ञान प्राप्त करना प्रारम्भ किया। 
श्री स्वामी मुक्तानन्दगिरी जी से व्याकरण के प्रारम्भिक ग्रन्थ पढ़ कर विविध विद्वानों से व्याकरण का ज्ञान प्राप्त किया तथा काव्य प्रकाश आदि साहित्य ग्रन्थों का अध्ययन किया। 
सांख्य योग दर्शन, ब्रह्म-सूत्र, शारिरिक भाष्यादि सहित श्रीमद्-भगवद् गीता आदि ग्रन्थों का अध्ययन, उपनिषद, वेदान्त के उच्च ग्रन्थ पढ़कर अद्वैत सिद्धि जैसे -दुर्लभ तथा दुरूह ग्रन्थों के विशिष्ट अध्ययन के साथ -साथ लगभग २५ वर्षों तक भारत के प्रसिद्ध सन्तों एवं आचार्यों से योग आदि में दीक्षित हुए। 
अन्त में सन् २००४ में प्रसिद्ध विरक्त सन्त श्री स्वामी लक्ष्येश्वराश्रम जी महाराज से सन्यास की उच्चतम् श्रेणी दण्ड सन्यास दीक्षा ग्रहण करके श्रीमद् दण्डी स्वामी महादेव आश्रम  के नाम से समाज में प्रतिष्ठित हुए। 
इस प्रकार परम श्रद्धेय भक्त वत्सल प्रातः स्मरणीय स्वामी बालचन्द्रानन्द सरस्वतीजी के आशीर्वाद से ब्राह्मण दम्पत्ति को पुत्र रूप में प्राप्त हुआ बालक आज हमारे मध्य १००८ श्री परम पूज्य दण्डी स्वामी महादेव आश्रमजी महाराज शुकतीर्थ मुख्य अतिथि के रूप में भगवान परशुराम प्रकाशोत्सव दिवस पर विद्योत्तमा कन्या महाविद्यालय के प्रांगण में श्रीयुत श्रीचन्द शास्त्री अध्यक्ष संस्कृत वर्द्धिनी  सभा एवं विद्योत्तमा कन्या महाविद्यालय गंगधाड़ी खतौली की श्रमजन्य पसीने की बूंदों से सिक्तरज से व्याप्त कण-कण को पवित्र करने हेतु उपस्थित हैं, जो हम सभी का गौरव, आस्था,निष्ठा तथा विश्वास है। 



Thursday, January 7, 2016

"उपासना कैसे करें ?"

"उपासना कैसे करें ?"






मैंने एक सिद्ध महात्माजी से पूछा-भगवन् ! भक्ति और उपासना के लिए जो वात्सल्यादि भाव हैं उनमें साधक अपने अनुकूल भाव का चुनाव कैसे करता है ? और आप किस भाव से उपासना करते है ?
महात्माजी ने कहा -जहां तक उपासना के भावों को चुनने का प्रश्न है इसमें कई बातें विचारणीय है। जैसे साधक के पूर्व संस्कार ,वंश,  परंपरागत  इष्ट या कुलदेवता, वातावरण इत्यादि अनेक कारण हो सकते है।  इसमें कोई खास नियम नहीं है।  साधक की जिस भाव पर सहज और स्वाभाविक रुचि एवं प्रेम हो जाये ,उसके लिए वहीं भाव उचित एवं अनुकूल रहता है। या फिर गुरु, साधक की रुचि की परीक्षा करके जिस भाव की दीक्षा दें, वहीं उसके लिए उचित है।
जितनी निश्चिन्तता मातृभाव के उपासक को होती है उतनी और किसी देवता के उपासक को नहीं हो सकती।  वात्सल्य भाव के उपासक को हर समय अपने लाला की चिंता में रहना पड़ता है। कहीं लाला भूखा तो नहीं रहा, लाला को नींद आ रही होगी ,सुला दू। लाला को ठंड लग रही होगी,ओढ़ा दू।  इससे कुछ कम दास्य भाव के उपासक को चिंता करनी पड़ती है कि मेरी सेवा में त्रुटि न रह जाये कहीं स्वामी नाराज़ न हो जाए।
सख्य भाव में भी एक दूसरे से अपेक्षाएं रखनी पड़ती है उनकी चिंता करनी पड़ती है और माधुर्य भाव ! बाप रे बाप उम्र भर विरह में रोना ही रोना !बड़ा कठिन है।ब्रजबालाओं के अतिरिक्त इतना कौन कर सकता है?उद्धव जी ने भी इनकी चरण रज की इच्छा की थी।
आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यामः (श्रीमदभागवत् १० /४७ /६१ )
परन्तु मातृभाव के उपासक के लिए सारी चिंता उसकी माँ को करनी पड़ती है।उसको स्वयं अपने गुजारे (योग -क्षेम ) के लिए कोई चिंता नहीं करनी पड़ती है। वह तो पानी में तूम्बे की तरह मस्त होकर पड़ा रहता है। मातृभाव का उपासक थोड़े से ही कष्ट में माँ को रोकर पुकारता है। तो वह जहां भी रहती है वहीं से भागकर आती है। वह कहता है 
निरालम्बो लम्बोदर जननी कं यामि शरणम्। 
अर्थात् हे माता ! इस समय यदि तुम्हारी कृपा नहीं होगी तो मैं अवलंब रहित होकर किसकी शरण में जाऊंगा ?

Wednesday, January 6, 2016

"व्यसन से मुक्ति परमावश्यक है "


"व्यसन से मुक्ति परमावश्यक है "





व्यसन शब्द के शुभ व अशुभ दोनॉ अर्थ होते है। 
व्यसन का प्रचलित अर्थ अशुभ ही है- जैसे बुरी आदत या लत , संकट , कष्ट , विपत्ति आदि है।  व्यसन  का शुभ  अर्थ है - "किसी कार्य की पूर्ति के लिए श्रमपूर्वक संलग्न होना। " जैसे -"विद्या व्यसनी या श्रुतौ व्यसन " इत्यादि।  परन्तु हम जो व्यसन से मुक्ति की बात करना चाहते है उसका तात्पर्य दुर्व्यसन या अशुभ कर्मों से मुक्ति ही प्रासंगिक है।  मनुजी महाराज ने व्यसनों को क्रोध , काम  से उत्पन्न होने वाले कामज दो प्रकार से बांटा है। 
मृगया∙क्षे  दिवास्वप्न“ परिवाद “ स्त्रियो  मद A
तौर्यत्रिकं वृथाट्या च  कामजो दशको गण“ AA
पैशुन्यं , साहसं द्रोह  ईर्ष्या सूयार्थ दूषणम् A
वाग्दण्डजं  च  पारुण्यं  क्रोधजोपि  गणो ∙ष्टक “ AA

अर्थात्-आखेट  या  मृगया , जुआ  खेलना , दिन में सोना , पराये दोषों को कहते फिरना , परस्त्री का सम्भोग करना , मद्यपान करना, व्यर्थ भटकना , नाच देखना , गीत सुनना और सदा ही वाद्य-वादन में लगे रहना  ये दस 'कामज व्यसन ' है  तथा चुगलखोरी , दुस्साहस , द्रोह (चुपके -चुपके किसी का बुरा करना ), ईर्ष्या या डाह करना , असूया (दूसरे का दोष निकालना ), धन चुराना अथवा धन लेकर वापस न देना , कठोर वचन बोलना और किसी को शारीरिक आघात पहुँचाना ये आठ क्रोधज अर्थात् क्रोध से उत्पन्न होने वाले व्यसन है।
व्यसन केवल इतने ही नहीं है दूसरे भी बहुत है।  कुमार्ग अर्थात् वेद विहित मार्ग के विपरीत चलना ही कुव्यसन है।
मनुष्य की आत्मा बहुत ही संवेदनशील होती है। उस पर मनुष्य -मन के शुभ एवं अशुभ भाव सहज ही अंकित होते जाते है। व्यसनों को करते रहने से उसके भाव अशुद्ध तथा दूषित हो जाते हैं और दूषित भावनाएं आत्मा को कलुषित कर देती है।  आत्मा जितनी ही कलुषित है , उसकी उर्द्धव गामिनी शक्ति उतनी ही कम हो जाती हैं और फिर कर्म-कषाय से आवृत गुरुतर आत्मा अधोगामिनी होकर मनुष्य की नरक यात्रा का कारण बन जाती है। यहां तक कि मनुष्य की वह आत्मा अपनी योनि से नीचे गिरकर वनस्पति योनि में जन्म लेती है और 'असंवेदनीय ' स्थिति झेलने को विवश होती है।
मानव जीवन का एक मात्र चरम लक्ष्य है मोक्ष।  एकमात्र मनुष्य जाति से ही जीव का मोक्ष संभव है।  जो मनुष्य व्यसनों में आसक्त होता है , उसे सम्यग् दर्शन की उपलब्धि नहीं होती है। फलतः उसका मोक्षमार्ग अवरुद्ध रहता है।
व्यसन बंधन का कारण होता है। बंधन की स्थिति में कर्मों का आत्यन्तिक क्षय नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में मनुष्य की आत्मा पराधीन रहती है और इसलिए मनुष्य के जीवन का परम लक्ष्य मोक्ष उससे दूर ही रहता है। अतः आत्मा की स्वाधीनता रूप मुक्ति के लिए व्यसन से मुक्ति का निरन्तर प्रयास अति आवश्यक है।  व्यसन से मुक्ति के बिना जीव विशुद्ध नहीं होता।व्यसन से मुक्ति पाने के लिए साधक को मन एवं आत्मा की कठोर साधना करनी चाहिए।शुद्ध आचरण(ऊपर बताये गये व्यसनों से अलग होकर जीवन जीना ही शुद्ध आचरण है )पूर्वक लगातार आत्म चिन्तन , व्यसनों से मुक्ति का महामन्त्र है।  इससे व्यसन रूप मिथ्यात्व से मुक्ति -प्राप्ति रूप सम्यक्तव की ओर आगे बढ़ने का मार्ग अपने आप साफ हो जाता है। और मनुष्य आत्मदर्शन की स्थिति , जिसे श्रीमद् भगवद् गीता में 'ब्राह्मी स्थिति ' कहा गया है , उस स्थिति में पहुंच जाता है।  इस प्रकार जिस पुरुषार्थ वादी को आत्मदर्शन या सम्यग् दर्शन प्राप्त हो जाता है, वह अवश्य ही व्यसन से विमुक्त हो जाता है। व्यसन से विमुक्त जीवन ही सच्चा जीवन है और व्यसन से मुक्ति का पुरुषार्थ ही सच्चा पुरुषार्थ है।