Sunday, March 20, 2016

"सती द्रौपदी की भावपूर्ण प्रार्थना"

परम पूज्य श्री गुरूदेव द्वारा रचित एक भावपूर्ण प्रार्थना







" मैं अपने अमेरिका प्रवास से वापस भारत आ रहा था, तो मन बरबस सा होकर भगवान् श्री कृष्ण की लीलाओं में जाने लगा, आनंदकंद बांके बिहारी भगवान् श्री कृष्ण के सम्मुख सती द्रौपदी ने सभागृह में नग्न करने को आतुर दुःशासन से रक्षा के लिए जो प्रार्थना की थी, मन उस पद्य रूपी प्रार्थना में अटक गया, वहीं प्रार्थना रूप पंक्तियां हवाई जहाज में बैठे-बैठे ही लिपिबद्ध कर दी, मन की यह पंक्तियां किसे भायेंगी किसे नहीं परन्तु मुझे तो भा गई -------"


मैं थारे पांव पडू जी गिरधारी,
हे जी रखियो लाज हमारी।।

जन्म हुवा था जी मेरा अनोखा, ब्याही गई तो वर मिला चोखा। 
मैं जी पांच वीरों की नारी, हे जी रखियो लाज हमारी,
मैं थारे पांव पडू जी गिरधारी।।

पाँचों छत्रपति बलधारी, हुए आज लाचार ये सारे। 
दुःशासन खींचे है सारी,  हे जी रखियो लाज हमारी,
मैं थारे पांव पडू जी गिरधारी।।

पीहर मेरा दूर घणी है, ससुर मेरा दुनिया में नहीं है। 
दादा भीष्म सा व्रतधारी, नहीं विपदा हरे हमारी। 
हे जी रखियो लाज हमारी,

मैं थारे पांव पडू जी गिरधारी।।

सत के पुतले द्रोण गुरूजी, बन गए पत्थर कृपाचार्यजी।
थारी बहना की खिंचरी सारी , हे जी विपदा पड़ गयी भारी। 
हे जी रखियो लाज हमारी,
मैं थारे पांव पडू जी गिरधारी।।

बिन तेरे हो भैया मेरे, दुःखड़े कौन हरेगा मेरे। 
तू चैतन्य नटवर और गिरधारी गिरधारी। 
हे जी रखियो लाज हमारी,
मैं थारे पांव पडू जी गिरधारी।।

Saturday, March 19, 2016

"दुनिया की प्रीत"

परम पूज्य श्री गुरूदेव द्वारा अमेरिका प्रवास के समय रचित भजन









प्रीत कर दुनिया वालों से बता तूने क्या कमाया रे।
पास जो तेरे हीरा था वह भी तूने लुटाया रे।।

बातों के जाल में फंसकर विषयों की आँधी में पगले,
तप की अग्नि का सोना भी मुफ्त में खा उड़ाया रे।
प्रीत कर दुनिया वालों से बता तूने क्या कमाया रे।
पास जो तेरे हीरा था वह भी तूने लुटाया रे।।

जिन्हें तू अपना समझे हैं वो स्वार्थ की प्रीत रखते हैं , मतलब के निकलने पर न सूरत याद रखते हैं।
तुम्हें देखा तो था शायद मगर न कुछ याद आता है, करें क्या बात रे भाई हमें न वक़्त मिलता है।
मिले होंगे ही हम तुमसे तुम क्या झूठ बोलोगे , ज़माने में बड़ा मुश्किल भरोसा करना होता रे।
प्रीत कर दुनिया वालों से बता तूने क्या कमाया रे।
पास जो तेरे हीरा था वह भी तूने लुटाया रे।।

वक़्त अब तंग आया तो तुझे सब याद आता है, करी थी तब तो मनमानी क्या ये भी याद आता है। 
तोड़ सब क़ायदे कानून वफ़ा की कसमें खा करके , अपना तो चैन तक छोड़ा जगत में सब लुटाया रे। 
गिरेगा अब तो यूँ ही दर्द बेदर्दी हो आया रे। 
प्रीत कर दुनिया वालों से बता तूने क्या कमाया रे।
पास जो तेरे हीरा था वह भी तूने लुटाया रे।।

मगर दर्द के याद करने से कभी क्या दर्द जाता है , छुपा बेदर्द जो होता वो उसको भी बढ़ाता है। 
हुवा बस रोग तुझको भी यहीं अब आजा प्यारे रे।
गिरा कर नज़रों के परदे खुदी में मस्त हो जा रे , दवाई है यही उत्तम मेरी तू मान भी ले रे। 
प्रीत कर दुनिया वालों से बता तूने क्या कमाया रे।
पास जो तेरे हीरा था वह भी तूने लुटाया रे।।

लगाकर पंख जो उड़ते वही कभी गिर भी जाते है , चले घुटनों के बल जो शख्स वो कहाँ लड़खड़ाते है। 
चला दे निश्च्य कर तेरा संभल कर वार कर दे रे , विजयश्री दर महेश्वर के फख्त आनी ही आनी रे। 
प्रीत कर दुनिया वालों से बता तूने क्या कमाया रे।
पास जो तेरे हीरा था वह भी तूने लुटाया रे।।

Thursday, March 17, 2016

" दान की नीति "

परम श्रद्धेय गुरूदेव द्वारा रचित पुस्तिका "नैतिक शिक्षा" में से साभार















हिमालय की उपत्यकाओं में एक संत रहा करते थे। वे प्रातः से सांय तक एकमात्र भगवत् चिन्तन किया करते थे। क्षुधा लगने पर यदा कदा आस पास के जंगल से कंदमूल फल आदि ढूँढ़कर खा लिया करते तथा जल पीकर तनिक विश्राम किया करते थे। एक बार कुछ धनिक पर्यटकों की मण्डली घूमते-घूमते उनके आसन के समीप तक जा पहुँची। उस समय संत अपने आसन पर बैठे हुए समाधि में विलीन थे। यात्रियों ने संत भगवान् के जागने पर उन्हें कई प्रकार की खाद्यादि सामग्री भेंट के लिये दी। महात्मा ने मना किया। यात्रियों ने कहा--"महाराज! हम तीर्थ यात्रा करने को निकले हैं, धार्मिक रीति के अनुसार हमें मार्ग में बहुत सी वस्तुओं को दान करना चाहिये। आप इस कार्य में हमारा सहयोग करें। कृपया इन वस्तुओं को ग्रहण करें।" संत बोले--बेटा, न तो मुझे किन्हीं सांसारिक पदार्थों की इच्छा है ना ही ये मेरे लिये उपयोगी हैं। मैं वनवासी हूँ। वन के ही कंदमूल आदि खाकर, वृक्षों की छाल आदि पहनकर मुझे सुख मिलता है।" तभी वहाँ साधु के वेश में एक भिखारी आ पहुँचा।  यात्रियों ने संत भगवान् से पूछा--प्रभु! क्या हम अपना यह दान के लिये लाया गया सामान इस संत वेशधारी को दे दें ? संत बोले--यदि देना ही है तो संकोच क्यों करते हो ?यात्री दल के मुख्य व्यक्ति ने कहा--"प्रभु! इसके पास पहले ही बहुत सा सामान है। इसका वेश आपके ही समान साधु जैसा है। आप फिर भी नहीं माँगते हैं, उलटे देने पर भी अस्वीकार करते हैं, यह बार-बार लेने के लिये गिड़गिड़ाता है, मेरी बुद्धि भ्रमित हो रही है कि मैं आपको अभिमानी कहुँ अथवा इस याचक को साधु ?" सहृदय संत यह सुनकर हंस पड़े और बोले--बेटा! संत और भिखारी में बड़ा सीधा अंतर है। उसे स्पष्ट समझकर ही दोनों के साथ व्यवहार करना चाहिये। शम, दम आदि के द्वारा संयमित, जितेन्द्रिय एवं सदाचारी, सदा शास्त्र के अनुसार आचरण करने वाला, दयालु, भगवत् भक्त संत होता है। संत भिक्षा जैसे दुष्कृत्यों द्वारा पदार्थों का संग्रह नहीं करता है, उलटे उनको त्यागता है। संत संसार में आवश्यकता से भी कहीं ज्यादा कम साधनों से अपना जीवन यापन करता हुआ ईश चिंतन करता है। संत साधनों के अभाव में कदापि इतना व्याकुल नहीं होता कि वह भिक्षाटन करे। वह यथास्थिति संतुष्ट रहता है। इसके विपरीत जो कायर पुरुष अपने स्वयं के निर्वाह के लिये भी आवश्यक वस्तुओं को नहीं जुटा पाते हैं, वे कामचोर साधुओं जैसा वेश बनाकर भीख माँगते फिरते हैं। वे स्वयं राष्ट्र एवं समाज के प्रति दोषी हैं। हे पुत्र! जब किसी राष्ट्र का एक व्यक्ति अपने राष्ट्र के लिये उपयोगी सिद्ध न होकर उलटे देशवासियों पर भार बन जाता है, तब वह अति नीचता को प्राप्त हो जाता है। भिक्षा माँगने से भी बढ़कर नीच कर्म भिक्षा देना है। जो व्यक्ति भिक्षा माँगता है वह तो एक मात्र मृतक ही है, परन्तु जो भिक्षा देता है वह राष्ट्रात्मा की हत्या के समान पाप करता है। मनुष्य को भिक्षा माँगने के स्थान पर उद्योग करना चाहिये। शास्त्रों में भी कहा गया है--
"उद्योगिनं पुरुष सिंहमुपैती लक्ष्मी"
अर्थात् उद्योग (परिश्रम) करने वाले श्रेष्ट पुरुष के समीप लक्ष्मी स्वयं चलकर जाती है। जो लोग राष्ट्र में भिक्षावृत्ति को बढ़ावा देते हैं, दयालु होने का दम भरकर अपने एकमात्र इस अहं की झूठी तुष्टि के लिए फैले हाथ पर वस्तु रखते हैं, कि हम श्रेष्ठ हैं, यह नीच हो गया जो इसने हमारे ही समान होकर भी हाथ फैलाया, उनमें दान भावना नहीं होती है। 
यदि दान देना ही हो तो पुण्य लाभ की दृष्टि से सच्चरित्र, निष्ठावान, सदाचारी, वैदिक कार्यों को करने वाले किसी योग्य ब्राह्मण के पास जाकर श्रद्धापूर्वक यथाशक्ति भेंट वस्तु ले जाकर, ज्ञान प्राप्ति की कामना करनी चाहिये। कहा भी गया है --
"दातव्यमिति यद्दानं दीयेतनुपकारिणेेेे"
अर्थात् यदि देना ही है तो दान की गई वस्तु सुपात्र एवं ऐसे व्यक्ति को देनी चाहिए, जिससे बदले में आपका कोई प्रति उपकार न होता हो। 
दान की यह भावना, राष्ट्र एवं समाज को तो दृढ़ता प्रदान करती ही है साथ ही परलोक लाभ भी मिलता है।   

Tuesday, March 1, 2016

श्री गुरूवंश परम्परा

वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्। 
यमाश्रितो हि वक्रोपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते।।  


Sunday, February 28, 2016

"लालच "


परम श्रद्धेय गुरूदेव द्वारा रचित पुस्तिका "नैतिक शिक्षा" में से साभार






नाम सुमिर पछतायेगा। 
पापी जियरा लोभ करत है आज काल उठ जायेगा। 
लालच लागी जन्म गंवाया माया भ्रम भुलायेगा। 
धन जीवन का गरब न कीजे कागज ज्यों गल जायेगा।  
अर्थात् मनुष्य के अंदर काम, क्रोध व लोभ आदि की वृत्ति प्राकृतिक देन है। इनसे युक्त मनुष्य सहज ही पापाचरण कर बैठता है। अतः हमें लालच आदि से बचने का प्रयत्न करना चाहिये। लालच के कारण मनुष्य की क्या दुर्गति होती है यह इस कहानी से स्पष्ट हो जाता है--
हीरामन नाम का एक ब्राह्मण बद्रीकाश्रम के पुण्य क्षेत्र में नैनसी नामक गाँव में अपने परिवार के साथ रहता था। हीरामन बड़ा भक्त था। वह गाँव के शिवालय में प्रतिदिन बड़ी निष्ठा एवं विधि से शिवपूजन किया करते थे। वहीं शिवालय के समीप एक बिल में एक महासर्प रहता था। पंडित हीरामन प्रत्येक दिन सर्प को दूध पिलाया करता थे। दूध पीकर वह सर्प एक बार बिल में जाता था और बाहर निकलकर उनको उसी समय एक स्वर्ण मुद्रा लाकर देता था। यही क्रम बरसों तक चलता रहा। एक दिन हीरामन को किसी कार्यवश पाँच दिनों के लिये बाहर जाना पड़ा। उसने सर्प देवता के सामने जाकर कहा कि मेरा बेटा मंगल मेरी ही भाँति नित्यप्रति आपकी सेवा को आया करेगा। सर्प देवता ने यह बात स्वीकार कर ली। पंडित हीरामन के बाहर चले जाने पर मंगल दूध लेकर सर्प के बिल के समीप रख आया, रोज़ की भाँति दूध पीते ही सर्प ने एक सोने की अशर्फी बिल के बाहर लाकर रख दी। यह देखकर मंगल बड़ा खुश हुआ। वह रोज़ की ही भाँति प्रत्येक दिन अशर्फी लाता था, एक दिन उसके मन में अशर्फियों के प्रति बड़ा लालच आ गया, वह सोचने लगा सर्प देवता के बिल में कोई बड़ा खजाना है, दूध के लालच के कारण सर्प देवता मुझे एक-एक अशर्फी ही प्रतिदिन देते हैं। क्यों न मैं इस महान सर्प को मारकर सारा खजाना एक ही दिन में ले लूँ ? यह सोचकर अगले दिन वह अपने साथ एक बड़ी लाठी लेकर शिवालय गया। सर्प देवता के दूध पीते समय लालची मंगल ने ज्यों ही लाठी का प्रहार सर्प पर करना चाहा उसी समय पहले से सावधान सर्प ने खड़े होकर तेज फुंकार छोड़ी तथा मंगल को डराकर तेजी से बिल में घुस गया। भयभीत मंगल बेहोश हो गया। होश में आने पर उसने देखा कि मेरी आँखों की ज्योति चली गयी है। यात्रा से लौटने पर हीरामन ब्राह्मण ने सर्प देवता के पास जाकर जोर-जोर से उन्हें पुकारा, परन्तु आज कोई उत्तर नहीं था। बहुत अधिक प्रयास करने पर निराश ब्राह्मण घर वापस आ गया। लालच के कारण उसके पुत्र ने सारा धन गंवा दिया। 
लालच बुरी बला है। 

Friday, February 26, 2016

"संतोष परमं धनं "

परम श्रद्धेय गुरूदेव द्वारा रचित पुस्तिका "नैतिक शिक्षा" में से साभार












गो धन गजधन बाजिधन और रतन धनखान। 
जब आवे संतोष सब धन धूरि समान।। 


अर्थात् गौधन, हाथियों का का धन, घोड़ों का धन और रत्न रूपी धन की खान, संतोष धन आने पर धूल के समान तुच्छ है। अतः संतोष मनुष्य का परम धन है। 
एक बार एक शहर में एक दम्पत्ति रहते थे। उनके कोई संतान भी न थी तथा धन की भी अत्यंत कमी थी, उन्हें एक समय का भी भोजन नहीं मिलता था। एक महात्मा ने प्रसन्न होकर उन्हें लक्ष्मी प्राप्ति का आशीर्वाद दिया। संत कृपा से भगवती लक्ष्मी ने प्रसन्न होकर उनके घर धन वर्षा की। लक्ष्मी को जाते देखकर गृह पत्नी ने रोते हुए लक्ष्मी माता के पैर पकड़ लिये और बोली--हे मैया! हम बड़े व्याकुल थे आपने अपार कृपा की है थोड़ी कृपा और करो। लक्ष्मीजी ने पलक झपकते ही उनके सारे घर को घुटनों तक स्वर्ण मुद्राओं से भर दिया। उन्हें और भी लालच हो आया। उन्होंने और धन की कामना की। लक्ष्मीजी ने प्रार्थना सुनकर और धन वर्षा की। उनका लालच फिर भी कम न हुआ, माता लक्ष्मी ने उन्हें बार-बार संतोष करने को कहा, वह न माने। अंत में रूष्ट होकर लक्ष्मी माता ने उन्हें पुनः निर्धन होने का शाप देते हुए कहा--जाओ! भिक्षावृत्ति से ही अपना गुजारा करो, इतना देने पर भी तुम्हें संतोष नहीं हुआ, संतोष के बिना धन-सुख नहीं मिलता। 

Thursday, February 25, 2016

"नरोत्तम ब्राह्मण"

परम श्रद्धेय गुरूदेव द्वारा रचित पुस्तिका "नैतिक शिक्षा" में से साभार






प्राचीन काल में नरोत्तम नाम का एक ब्राह्मण था। वह माता-पिता की सेवा छोड़ कर तीर्थाटन करने लगा। वह विधि-विधान से तीर्थ-यात्रा कर रहा था। उससे कोई पाप नहीं हो रहा था। वह खान-पान, रहन-सहन में नियन्त्रित था। इस पुण्य के प्रभाव से उसके कपड़े आकाश में बिना आधार के अपने आप सूखा करते थे। नरोत्तम के मन में अहं भाव आ गया। वह सोचने लगा कि मेरे समान तपस्वी दूसरा कोई नहीं है। एक बार एक बगुले ने उसके मुँह पर बीट कर दी। अभिमानी को क्रोध आ गया और उसने उस पक्षी को अपनी दृष्टि मात्र से ही जला डाला। अब तो उसका अभिमान और बढ़ गया। वह सोचने लगा-- मैं जिसे चाहूँ उसे भस्म  कर सकता  हूँ। इतने में आकाशवाणी हुई--"ब्राह्मण! तुम परम धर्मात्मा मूक चाण्डाल के पास जाओ। वहाँ जाने से तुम्हें अपने कर्तव्य का बोध होगा।" वह चांडाल के पास पहुँचा। उसने देखा कि मूक चांडाल का घर बिना दीवारों के ही आकाश में स्थित है और उस घर में ब्राह्मण भी बैठा हुआ था। मूक चांडाल अपने माता-पिता की सेवा में लगा था। वह जाड़े के दिनों में उनके लिए गर्म पानी का प्रबंध करता, गर्म भोजन की व्यवस्था करता और रूईदार कपड़ों को पहनाता था। इसी तरह गर्मी और बरसात में भी ऋतु के अनुसार भोजन व वस्त्रों से उनका पूरा-पूरा सम्मान करता था।ब्राह्मण ने महात्मा मूक से कहा--"तुम मेरे पास आओ और मेरे हित की बात बताओ।" चांडाल ने उसका स्वागत किया और कहा --"आप द्वार पर प्रतीक्षा कीजिए मेरे लिए माता-पिता की सेवा अतिथि सेवा से बढ़कर है।" इस पर अभिमानी ब्राह्मण ने कहा तुम्हारे लिए ब्राह्मण सेवा से बढ़कर और कौन सी सेवा हो सकती है ? यदि मेरी उपेक्षा करोगे, तो मैं शाप दे दूँगा। " धर्मात्मा मूक ने विनयपूर्वक कहा--"महाराज! मैं बगुला नहीं हूँ कि आपके शाप से भस्म हो जाऊँगा। अब आपकी धोती आकाश में भी नहीं सूखा करती। थोड़ी देर ठहरें तो मैं आपकी सेवा अवश्य करूँगा, शीघ्रता हो तो आप पतिव्रता के पास जाएँ। 
शिक्षा : मातृदेवो भव, पितृदेवो भव 
ब्राह्मण पतिव्रता के घर की ओर चल पड़ा तो इसी बीच महात्मा मूक के घर में स्थित ब्राह्मण रूप धारी भगवान् विष्णु बाहर निकल आए और ब्राह्मण से बोले--"चलो मैं आपको रास्ता बताता हूँ।" ब्राह्मण ने भगवान् से पूछा कि आप ब्राह्मण होकर उस चांडाल के घर में क्यों रहते हैं ? वहाँ तो स्त्रियाँ भी रहती हैं ? भगवान् ने कहा ब्राह्मण ! इस समय तुम्हारा हृदय पवित्र नहीं है। पतिव्रता आदि के दर्शन के बाद ही पवित्र हृदय होने पर तुम मुझे पहचान सकोगे। ब्राह्मण ने कहा--"भगवान् वह पतिव्रता कौन है ?" भगवान् ने कहा --"पतिव्रता स्त्री वह होती है जो सदा अपने पति की सेवा में लगी रहती है। ऐसी पतिव्रता स्त्री अपने पिता और पति दोनों कुलों की सौ-सौ पीढ़ियों का उद्धार कर देती है। " पतिव्रता के घर के पास पहुँच कर भगवान् अन्तर्धान हो गये। ब्राह्मण को बड़ा आश्चर्य हुआ। द्वार पर आहट को सुनकर पतिव्रता ने बाहर आकर ब्राह्मण से कहा--" आप कुछ देर प्रतीक्षा करें, इस समय मैं पति की सेवा में हूँ। अवकाश मिलने पर आपकी सेवा करूँगी, आप मेरा आतिथ्य स्वीकार करें।" ब्राह्मण क्षुब्ध होकर बोला--"मुझे इस समय भूख प्यास नहीं है अतः आतिथ्य की आवश्यकता नहीं। मुझे मेरे हित की बात बताओ अन्यथा मैं शाप दे दूँगा।" पतिव्रता ने कहा --"हे ब्राह्मण! मैं कोई पक्षी नहीं हूँ जो आपके जलाए जल जाऊँगी अतः शाप देने का कष्ट न करें। यदि आपको जल्दी है तो तुलाधार वैश्य के पास जाइए। " इसके पश्चात् वह अपने गृह कार्य में लग गयी। ब्राह्मण ने चांडाल के घर में बैठे उस पंडित को पतिव्रता के घर देखकर कहा--"ब्राह्मण! इस पतिव्रता ने मेरे साथ घटित घटनाओं को कैसे जान लिया ?" भगवान् ने कहा--"अत्यंत पुण्य और शुद्ध आचरण से तीनों कालों का ज्ञान हो जाता है। चलों, तुलाधार वैश्य के घर चलें। 
शिक्षा : पति ही परमेश्वर है 
भगवान् ने कहा तुलाधार वाणिज्य व्यवसाय में लगे रहते हैं। वे सबमें भगवान को देखते हैं, अतः सबका सम्मान करते हैं। वे सदैव सबके उपकार में तत्पर रहते हैं। उनके मन, वाणी या कर्म से कभी किसी का अहित नहीं हुआ। उनकी यह समता की दृष्टि अद्भुत् है। उनकी दूसरी विशेषता यह है कि वे आज तक कभी झूठ नहीं बोले। इसलिए सब लोग उन्हें धर्म तुलाधार कहते हैं। 
थोड़ी देर में दोनों तुलाधार के पास पहुँचे, उन्हें बहुत सी स्त्रियों एवं पुरूषों ने घेर रखा था। ब्राह्मण को वहाँ आया देखकर तुलाधार ने खड़े होकर उनका स्वागत किया तथा कहा--"आपका पधारना किसलिए हुआ ?" ब्राह्मण ने कहा--"मैं आपसे धर्म का उपदेश सुनने आया हूँ।" तुलाधार बोले--"मेरे पास जो भीड़ बैठी है मैं इससे रात तक ही निवृत हो पाऊँगा। अतः आप धर्माकर के पास जाएँ, वे आपको पक्षी के जलाने से उत्पन्न दोष और अब आकाश में आपकी धोती न सूखने के कारण को आपको बताएंगे। " यह सुनकर वह ब्राह्मण भगवान् के साथ धर्माकर के घर पहुँचे। मार्ग में वह ब्राह्मण भगवान् से पूछने लगा--"यह तुलाधार सवेरे से शाम तक जनता की भीड़ में घिरा रहता है, संध्या, भजन व तर्पण आदि साधन की क्रियाओं को भी पूरी तरह नहीं कर पाता है फिर इसमें इतनी शक्ति कहाँ से आ गयी, जिससे इसने मेरी बीती हुई घटनाओं को देख लिया। " भगवान् ने बताया--"जो सत्य और समता दो गुणों से युक्त है, जो प्रत्येक प्राणी में भगवान् को देखता हो, उसकी सेवा करता हो, वह व्यक्ति अपनी इसी सम दृष्टि के द्वारा तीनों लोकों को जीत लेता है। देवता, ऋषि, पितर उसपर प्रसन्न रहते हैं, उसे दिव्य दृष्टि मिल जाती है। वह सभी प्राकृतिक रहस्यों को सरलता से जान लेता है। यह सब तुलाधार के पास है। 
शिक्षा :सबके प्रति समानता 
इसके बाद ब्राह्मण ने धर्माकर के सम्बन्ध में पूछा, तो भगवान् ने कहा कि धर्माकर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह कभी किसी से द्रोह नहीं करता। अद्रोह की साधना के कारण उनमें समस्त गुण अपने आप आ गये वह जितेन्द्रिय है --
                        एक बार एक राजकुमार को किसी कार्यवश छः माह के लिए विदेश जाना था। वह अपनी पत्नी को लेकर धर्माकर के पास पहुँचे तथा पत्नी की रक्षा का प्रस्ताव किया। धर्माकर ने कहा --"न तो मैं आपका भाई हूँ, न सगा, सम्बन्धी, मेरे पास अपनी पत्नी को छोड़कर विदेश में आप कैसे निश्चिंत रह सकोगे ?" राजकुमार ने कहा--"मुझे आप पर पूर्ण विश्वास है। " धर्माकर ने कहा--"आपकी पत्नी बहुत सुंदरी है इसके सतीत्व की रक्षा करना मेरे वश की बात नहीं है। " राजकुमार ने दृढ़ता से कहा--"कृपया आप यह भार स्वीकार कर ही लें तथा साथ ही पत्नी से कहा--ये जैसा आदेश दे वैसा ही करना यह मेरी आज्ञा है।" राजकुमार के लौट आने पर धर्माकर ने कहा--"मैं अपने तपोबल के कारण जान गया हूँ कि संसारी लोग आपकी पत्नी व मुझे लेकर अनेक प्रकार की अनर्गल बातें कर रहे हैं। इस तरह मेरा लोकापवाद हो रहा है। इसके लिए मैंने आग जला रखी है इसी में कूदकर मैं अपनी सत्यता प्रमाणित करूँगा। यह कहकर वह आग की ज्वालाओं में सुखपूर्वक खड़े हो गये। देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की। जिन लोगों ने धर्माकर के प्रति दुर्वचन कहे थे, उनके मुख पर कुष्ठ हो गया। ब्राह्मण रूप धारी भगवान् यह बताकर पुनः अंतर्धान हो गये। तब नरोत्तम ने धर्माकर से कहा--"आप मुझे कुछ हित की शिक्षा दें। धर्माकर ने कहा--"अब तुम्हें कही नहीं जाना पड़ेगा बस एक मात्र वैष्णव ब्राह्मण के पास जाओ वहाँ आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।"
शिक्षा :किसी से द्रोह न करना    
नरोत्तम ने वैष्णव ब्राह्मण के घर जाकर दिव्य तेज से युक्त वैष्णव ब्राह्मण के दर्शन किये। वैष्णव ने नरोत्तम का स्वागत किया और बताया कि आज तुम्हारा कल्याण अवश्य हो जायेगा। मेरे घर में साक्षात् भगवान् विष्णु रहते हैं, जाओ उनके दर्शन करो। नरोत्तम ने जो ब्राह्मण मार्ग में उनके साथ था उसे ही कमल के आसन पर बैठे हुए विष्णु भगवान् के रूप में देखा। नरोत्तम समझ गया कि ब्राह्मण के वेश में मूक चांडाल आदि के घर भगवान् विष्णु ही थे। उसने गद् गद् होकर प्रार्थना की कि अब आप अपना स्वरूप दिखाइये। भगवान् के दिव्य स्वरूप का दर्शन करने के बाद ब्राह्मण ने कहा--"हे प्रभु! मेरा मन आप में ही सदा लगा रहे अन्य किसी काम में मेरी कोई इच्छा न हो।" भगवान् ने तथास्तु कहा तथा नरोत्तम को बताया कि पुत्र का कर्तव्य है कि वह माता-पिता की निरन्तर सेवा करें। तुम्हारे माता-पिता तुमसे आदर नहीं पा रहे हैं। उनकी पूजा से तुम्हारा कल्याण होगा, क्योंकि तुम्हारे पिता तुम्हारे लिए दुःखी हैं। उनके दुःख पूर्ण उच्छ्वास से तुम्हारी तपस्या प्रतिदिन नष्ट होती जा रही है। यदि माता पिता कोप करें तो ब्रह्मा भी उसे नहीं बचा सकते। तुम्हारा पहला कर्त्तव्य है कि तुम सीधे माता-पिता के पास जाओ और भली भाँति उनकी पूजा करो। उन्हीं की कृपा से तुम मेरे धाम में आओगे।